
मथुरा,
अभी-अभी प्राची बर्तन धो कर खड़ी हुई थी। इस वक्त उसके कपड़े पूरी तरह से भीग चुके थे। कौशल्या जी अब घर पर से जा चुकी थी। वही राघव, जिसने अभी-अभी किवाड़ बंद किया था। जैसे ही उसने पलट कर प्राची की तरफ देखा, तो एक पल के लिए प्राची का दिल दहल उठा। राघव की नजरे बेहद गंदी थी उस पर, यह तो वह पहले से ही जानती थी। लेकिन आज उसकी नजरों में हवस साफ दिखाई दे रही थी। वहीं राघव उसकी तरफ देखते हुए बोला, "बहुत इत्मीनान से इंतजार कर रहे थे हम तुम्हें इस तरह से दीदार करने के लिए, आज तुम भी अकेली और हम भी अकेले। चलो, अपना अकेलापन दूर करते है। वैसे भी भीग चुकी हो तुम सारी, जाओ जाकर कपड़े बदल लो। कहो तो हम बदलवा दे।" इतना कहकर राघव ने अपने कदम उसकी तरफ बढ़ाए ही थे कि तभी प्राची ने इधर-उधर देखा, तो उसकी नजर सामने पड़े हुए चाकू पर गई। अगले ही पल, वह उसकी तरफ भागी, तो एक पल के लिए राघव की आंखें बड़ी हो गई।
वह प्राची की तरफ देखते हुए बोला, "खबरदार! अगर तूने चाकू उठाया तो, यह चाकू मैं तेरे पेट में घोंप दूंगा।।मेरी मां भी तुझ पर विश्वास नहीं करेगी। जानती है ना तू कितनी मनहूस है इस घर के लिए। अगर मेरे काम आ जाएगी, तो तेरा क्या चल जाएगा। चल तेरे कपड़े बदलते है। साथ ही साथ तुझे बहुत कुछ दूंगा, बहुत प्यार दूंगा।" इतना कहकर रघु उसकी तरफ बढ़ रहा था। वही प्राची रोते हुए उस चाकू को पकड़कर उसकी तरफ करते हुए बोली, "खबरदार! अगर आप मेरे पास आए तो। हम, हम कुछ बोलते नहीं है, इसका मतलब यह नहीं है कि हमें हमें... तकलीफ नहीं होती। आप क्या चाहते हैं आप क्यों हमारे पीछे पड़े हैं। हम आपके भाई की बीवी हैं, उनकी विधवा है, आप फिर भी हमारे पीछे पड़े हुए हैं। आपके सगे भाई थे वह।"
तभी रघु उसकी तरफ गहरी नजरों से देखते हुए बोला, "तो क्या हुआ, वह तो मर गया ना। अगर वह मर गया है, तो मेरे साथ वह सब कर भी लोगी तो क्या ही फर्क पड़ेगा।। वैसे भी मां तो घर पर है नहीं, किसी को कुछ नहीं पता चलेगा। बाबा भी उधर ही चले गए हैं।" इतना कहकर रघु अपने कदम दोबारा से प्राची की तरफ बढ़ाने लगा।
वहीं दूसरी तरफ सड़क पर अभी प्रत्यक्ष की गाड़ी गांव में इंटर हुई ही थी। मंदिर तक जाने का रास्ता गांव से होकर गुजरता था, इसीलिए ड्राइवर ने अभी गांव में गाड़ी मोड़ी ही थी कि तभी कुछ ही दूरी पर जाकर प्रत्यक्ष की गाड़ी एकदम से रुक गई। गाड़ी रुकने की वजह से ड्राइवर के चेहरे पर परेशानी झलकने लगी। उसने पलट कर प्रत्यक्ष की तरफ देखा और बोला, "लगता है मालिक, इंजन को थोड़ा ठंडा करना जरूरी है। हमें इंजन पर पानी डालना होगा। लेकिन यहां पर पानी मिलेगा नहीं साहब, क्या करें?"
उसकी बात पर प्रत्यक्ष ने एक नजर उसकी तरफ देखते हुए बोला, "तो मैं लेकर आऊं पानी?" प्रत्यक्ष की बात पर ड्राइवर हड़बड़ा गया और सिर झुकाते हुए बोला, "नहीं मालिक, मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा। मेरे कहने का मतलब था...।" अभी वह बोल ही रहा था कि तभी प्रत्यक्ष गहरी आवाज में बोला, "जाओ, जाकर पानी का इंतजाम करो।" जैसे ही प्रत्यक्ष ने यह बात कही, ड्राइवर का चेहरा एक बार फिर से परेशानी से भर गया। लेकिन कुछ सोचते हुए वह प्रत्यक्ष की तरफ देखते हुए बोला, "साहब, यहां पर पानी पास में कहीं नहीं मिलता है। दूर से ही पानी भर कर लाना पड़ता है।" उसकी बात पर प्रत्यक्ष चुप हो गया। अब तो वह काफी ज्यादा दूर आ चुके थे। राठौर हवेली भी काफी दूर थी। इसीलिए प्रत्यक्ष अब उसकी तरफ देखते हुए बोला, "ऐसा करो, इन्हीं में से किसी गांव के घर में से पानी के बारे में पूछ लो।"
उसकी बात पर ड्राइवर ने कुछ सोचते हुए कहा, "लेकिन साहब, यहां के लोग पानी के बहुत पुजारी हैं। देंगे नहीं साले पानी जल्दी।" तभी प्रत्यक्ष ने उसकी देखते हुए कुछ सोच कर अपनी जेब में से एक गद्दी पैसों की निकाली और उसकी तरफ बढ़ाते हुए बोला, "अगर ना माने, तो तुम्हें पता ही है कि कैसे मनाना है।" उसकी बात पर ड्राइवर का चेहरा चमक उठा। उसने वह पैसे लिए और बाहर की तरफ निकल आया।
वहीं दूसरी तरफ राघव अपने कदम प्राची की तरफ बढ़ा रहा था। जिसे देखकर प्राची का दिल बुरी तरह से कांप रहा था। ना चाहते हुए भी उसके कदम बार-बार पीछे की तरफ हो रहे थे। वो किवाड़ की तरफ जाना चाहती थी, ताकि वह बाहर की तरफ निकल सके। लेकिन वह निकल नहीं सकती थी, क्योंकि आगे ही राघव खड़ा था। राघव धीमे-धीमे कदमों से उसकी तरफ बढ़ रहा था कि तभी वह पूरी तरह से उसके पास आया। अगले ही पल, उसने प्राची की चुनरी पकड़ी। जैसे ही उसने प्राची की चुनरी पकड़ी, जो कि उसने बड़ी नज़ाकत से बांधी हुई थी। उसने चुनरी इस कदर बांधी थी कि उसके बदन का कोई भी हिस्सा दिखाई नहीं दे रहा था। सीना तक पूरी तरह से छुपा हुआ था। लेकिन राघव ने उस चुनरी को पूरी तरह से खींच दिया था। उसके खींचते ही उसका गोरा दूध सा सीना, जो कि ऊपर की तरफ हल्का-हल्का उभरा हुआ था। राघव की आंखों के सामने था और उसके सीने को देखकर राघव को अपने शरीर में एक अलग ही गरमाइश महसूस होने लगी। वह अपनी जीभ को अपने होठों पर चलाते हुए बोला, "आज तो मजा आने वाला है।" राघव का घिनौना रूप देखकर इस वक्त प्राची को उससे घिन महसूस हो रही थी।
अब वह एक बार फिर से उसके पास आया और अगले ही पल, प्राची की कमीज को कंधों से पकड़ते हुए एक ही झटके से खींच दिया। जिससे प्राची के कंधे से कमीज फट गई। उसके बाजू अभी भी थी, लेकिन उसका सीना अब और भी ज्यादा दिखाई देने लगा था। उसे यूं देखकर राघव की आंखों में हवस और भी ज्यादा बढ़ गई। अब वह उसके पास और भी ज्यादा होने लगा कि तभी उनका किवाड़ बजना शुरू हो गया। जैसे ही किवाड़ बजना शुरू हुआ, राघव के जबड़े पूरी तरह से कस गए।
उसका दिमाग पूरी तरह से घूम चुका था कि इस वक्त कौन आया होगा। लेकिन जो भी शख्स था, उसे इस वक्त उस शख्स पर बहुत ज्यादा गुस्सा आ रहा था। उसका दिल कर रहा था कि उसका मुंह तोड़ दे, जो भी शख़्स इस वक्त दरवाजे पर होगा। लेकिन वह शख्स लगातार दरवाजे को खटखटाए जा रहा था। वही राघव भी इस वक्त प्राची के पास से हिलने को तैयार नहीं था। वही प्राची चिल्लाते हुए बोली, "देखिए, पीछे हट जाइए, दरवाजा कोई खटखटा रहा है। जाइए, दरवाजा खोलिए। हम हमने आपका क्या बिगाड़ा है, जो आप हमारे पीछे इस कदर पड़े हैं।" जिस तरह से प्राची चिल्ला रही थी, साफ पता चल रहा था कि वह बाहर खड़े शख्स को सब कुछ बता रही थी। उसको यूं चिल्लाता हुआ देखकर राघव की आंखें बड़ी हो गई। वह जल्दी से उसके होठों पर अपना हाथ रखते हुए दांत पीसकर बोला, "हरामजादी, कलमुंही, कुत्तिया, लोगों को बताना चाहती है कि मैं तेरे साथ क्या कर रहा हूं। तेरा तो अभी मैं कल्याण करता हूं।" इतना कह कर उसने प्राची के बालों को पकड़ा और अगले ही पल उसका सिर सामने दरवाजे में दे मारा। जैसे ही दरवाजे में प्राची का सिर लगा, एक पल के लिए प्राची के आंखों के आगे धुंधलापन छा गया। बाहर खड़ा शख्स, जो कि ड्राइवर था, उसने भी प्राची की आवाज़ सुन ली थी। प्राची की आवाज सुनकर एक पल के लिए ड्राइवर की आंखें बड़ी हो गई। वह अब खुद में बड़बड़या, "लगता है किसी के साथ कुछ बुरा हो रहा है।" इतना कहकर वह पीछे की तरफ हटा। अब वह भागते हुए अपनी गाड़ी के पास चला गया। वही उसकी गाड़ी कुछ 15 मिनट की दूरी पर ही खड़ी थी।
देखते ही देखते वह 15 मिनट में अपनी गाड़ी के पास पहुंचा। इस वक्त ड्राइवर पूरी तरह से हांफ रहा था, क्योंकि वह भागते हुए गया था।
वहीं दूसरी तरफ,
राघव, जोकि इस वक्त प्राची को देख रहा था, उसके चेहरे पर गुस्सा तो पहले ही झलक रहा था। लेकिन अब उसके चेहरे पर डेविल स्माइल आ चुकी थी। क्योंकि अब किवाड़ बजना भी बंद हो गया था। मतलब साफ था कि जो शख्स दरवाजे पर था, वह जा चुका है। राघव अब प्राची के बिल्कुल पास आया और अगले ही पल उसने उसके बदन को देखना शुरू किया। जिस कदर वह उसके बदन को देख रहा था, ऐसा लग रहा था, वह अपनी नजरों से उसका बदन खा रहा है।
वही प्राची, जिसको कुछ भी समझ नहीं आ रहा था, एक पल के लिए उसका दिमाग ब्लैंक हो चुका था। अब एक बार फिर से वह खुद को संभालते हुए अपनी जगह से खड़ी हुई। उसके माथे से हल्का सा खून बहने लगा था। वही राघव अब करीब होने लगा, जिससे प्राची के कदम पीछे की तरफ लड़खड़ा गए। वह एकदम से नीचे जा गिरी और नीचे गिरते ही प्राची की सांस गहरी हो गई, क्योंकि उसकी कमर में भी चोट लगी थी। जिस वजह से उसकी आह भी निकल गई थी। लेकिन अगले ही पल, उसके हाथ में कुछ ऐसा लगा, जिसे महसूस कर प्राची शांति से नीचे की तरफ लेटी रही। उसको नीचे गिरते हुए देखकर अब राघव अपनी पैंट का बटन खोलने लगा। वह उसके ऊपर झुकने को हुआ कि तभी प्राची ने एक झटके से अपने हाथों में पकड़ा हुआ चाकू, जोकि तब गिरा था, जब राघव ने उसका सिर दरवाजे में दे मारा था।
प्राची ने अब वह चाकू एकदम से अपने हाथ में पकड़ा और तेजी से राघव के पेट में दे मारा। हालांकि पेट में इतना ज्यादा लगा नहीं था। बस दूसरी तरफ थोड़ा सा अंदर की तरफ धंस गया था। जिससे राघव पूरी तरह से तड़प उठा। वह अपने पेट पर हाथ रखते हुए दूसरी तरफ जा गिरा। जैसे ही वह दूसरी तरफ जा गिरा, प्राची ने इस चीज का फायदा उठाया और अपनी जगह से उठते हुए उसने अपना दुपट्टा देखा, जो वही साइड पर पड़ा हुआ था। उस दुपट्टे को उठाकर उसने खुद पर ओढ़ा और बरामदे में आकर दरवाजा खोलकर बाहर की तरफ भाग गई। इस वक्त, प्राची की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। दूसरी तरफ राघव, जिसे चाकू इतना ज्यादा खास लगा नहीं था, उसने अब किसी तरह खुद को संभाला और चाकू को साइड पर फेंकते हुए बोला, "साली रंडियां, हरामजादी, तू मुझ पर हमला करेगी। अब तू देख मैं तेरा कैसे तमाशा बनाता हूं लोगों के सामने, कुत्तियां।
आज तेरी खैर नहीं।" इतना कह कर वो अपनी जगह से उठा और उसने इधर-उधर देखा, तो वहीं पर कौशल्या चाचा का दुपट्टा भी पड़ा हुआ था। उसने अब वह दुपट्टा लिया और अपनी कमर पर बांध लिया। इस वक्त जिस कदर उसके पेट से हल्का-हल्का खून बह रहा था, उसे बहुत दर्द हो रहा था। राघव अपनी जगह से खड़ा हुआ और अब वह भी प्राची के पीछे लग चुका था।
वहीं दूसरी तरफ प्रत्यक्ष, जो कि आराम से गाड़ी में बैठा हुआ था। जैसे ही उसकी नजर ड्राइवर पर पड़ी, तो एक पल के लिए वह गहरी नजरों से ड्राइवर को देखते हुए बोला, "क्या हुआ, लगता है कहीं से मरवा कर आ रहे हो।" उसकी बात सुनकर एक पल के लिए ड्राइवर की आंखें बड़ी हो गई। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि प्रत्यक्ष उसे इस तरह का कोई जवाब देगा। लेकिन अब उसका हांफना थोड़ा कम हो चुका था। ड्राइवर अब प्रत्यक्ष की तरफ देखते हुए बोला, "नहीं साहब, लगता है इस घर में किसी लड़की के साथ बहुत बुरा हो रहा है।" उसकी बात पर प्रत्यक्ष ने एक आईब्रो ऊपर की तरफ उठाई और बोला, "तो इसमें मैं क्या कर सकता हूं?" उसकी बात पर ड्राइवर चुप हो गया। कुछ देर उसकी तरफ देखते हुए वह बोला, "क्या पता साहब, वह लड़की मुसीबत में हूं। क्या हम उसकी मदद...?" उसने इतना ही कहा था कि तभी प्रत्यक्ष सर्द आवाज में बोला, "तुम्हें पानी लाने भेजा था, पानी ले आए।" उसकी बात पर ड्राइवर ने अपने हाथ में पड़ी हुई केन की तरफ देखा, जो की पूरी तरह से खाली थी। वह फीका सा मुस्कुराते हुए बोला, "मैं अभी लाता हूं, साहब, बस अभी, बस मुझे 15 मिनट दीजिए।" तभी प्रत्यक्ष दांत पीसकर बोला, "जल्दी जाओ और पानी लेकर आओ।"
उसकी बात पर ड्राइवर ने हां में सिर हिलाया और पानी लेने चला गया। तकरीबन 15 20 मिनट बाद कहीं से ड्राइवर पानी लेकर आया और उसने इंजन पर पानी डालकर थोड़ा बहुत गाड़ी को चलने लायक कर लिया। अब वह वहां से निकल चुके थे। अभी वह कुछ ही दूरी पर गए ही थे कि तभी प्रत्यक्ष की नजर एक लड़की पर गई, जोकि बदहवास सी रास्ते पर भागे जा रही थी। उस लड़की की हालत बेहद खराब थी।
To be continue...





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