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Ghatiya nazre

राठौर हवेली,

प्रत्यक्ष की गाड़ी इस वक्त राठौर हवेली के आगे आकर रुकी थी। हवेली को देखते ही उसके चेहरे पर अजीब से एक्सप्रेशन आ गए थे। लेकिन अगले ही पल उसने अपने चेहरे को नॉर्मल किया और अपनी गाड़ी से निकलकर बाहर की तरफ आया। अब उसने अपनी आंखों पर चश्मा चढ़ा लिया था, जबकि उसे हवेली के अंदर जाना था, कहीं बाहर नहीं। फिर भी उसने अपनी आंखों पर चश्मा चढ़ा लिया था। अब वह अंदर की तरफ आया कि तभी उसके कानों में कमला चाची की आवाज पड़ी।

"तो आ गए तुम, मेरा बच्चा?" इतना कहते हुए कमला चाची दरवाजे तक आई। अगले ही पल, उन्होंने नौकर को अपनी तरफ आने का इशारा किया। वहीं प्रत्यक्ष अब दरवाजे पर खड़ा था और कमला चाची को देख रहा था। लेकिन फिलहाल के लिए उसने कमला चाची से कुछ नहीं कहा। वही कमला चाची ने अब अपने हाथों में नोटों का बंडल लिया और प्रत्यक्ष पर घूमाते हुए उस नौकर को देते हुए बोली, "यह पूरे स्टाफ को बांट देना।" इतना कहते हुए कमला चाची बड़ी अदा से अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक करते हुए प्रत्यक्ष की तरफ देखकर बोली, "तो बेटा, कैसा रहा तुम्हारा यह सफर? अभी सुबह ही तो तुम आए हो, तो मैंने सोचा कि तुम्हारी थोड़ी नजर उतार दूं। कहीं इतने लोगों के बीच तुम्हें नजर ना लग गई हो, मेरे बच्चे।" इतना कहते हुए उसकी बलिया लेने लगी।

तभी पीछे से एक और ठंडी आवाज कमला चाची के कानों में पड़ी। "हां, ढकोसले बाजियों में तुम कहां पीछे हटने वाली हो।" यह आवाज कमला चाची के पति हरीश की थी। हरीश अब आगे की तरफ आए और कमला की तरफ देखते हुए बोले, "ढकोसले बाजी, तुम मानोगी नहीं ना।" अभी वह बोल ही रहे थे कि तभी कमला चाची दांत पीसकर बोली, "आप तो चुप ही रहिए। आपको यह ढकोसले लगते होंगे, लेकिन मेरे बच्चे को किसी की नजर भी तो लग सकती है।" कमला चाची की बात सुनकर हरीश जी ने उसे तिरछी नजरों से देखा। फिर मन ही मन बोले, "जितने मर्जी झूठ बो लो, लेकिन यह लड़का सब जानता है।" इतना कहते हुए हरीश अब अंदर की तरफ चले गए। क्योंकि उसे कमला चाची की ढकोसले बाजी में कोई इंटरेस्ट नहीं था। दूसरी तरफ से प्रत्यक्ष, जोकि एक्सप्रेशंस less होकर खड़ा था, वह अब कमला चाची की तरफ देखकर बोला,,ल

"चाची, फिलहाल के लिए मेरी मीटिंग है, मुझे यहां की ऑफिस में जाना है। तो प्लीज, क्या मैं जा सकता हूं?" उसकी बात पर कमला चाची मुस्कुराते हुए बोली, "हां हां जरूर, जाओ जाकर रेडी होकर आओ। मैं तुम्हारे लिए नाश्ता बनवाती हूं।" इतना कहकर वह रसोई की तरफ जाने को हुई। तभी एक लड़की की चहकती हुई आवाज कमला चाची के कानों में पड़ी, "मम्मा,

मुझे भी बहुत भूख लगी है। प्लीज, मुझे भी खाना दे दो ना।" अभी वह बोल ही रही थी कि तभी कमला चाची उसे गुस्से भरी नजरों से देखते हुए बोली, "क्यों, क्या बात है तेरे हाथ टूटे हुए हैं क्या? जा जाकर ले ले। आई बड़ी मुझसे मांगने वाली। बस सजने पर ही ध्यान रखे हो। यह नहीं कि जाकर रसोई में कुछ काम धंधा कर ले। जब देखो, पड़ी रहती है इधर-उधर।" तभी वह लड़की, जिसका नाम कोयल था, वह कमला चाची की तरफ देखते हुए बोली, "मां, आप भी ना, बाद में काम ही तो करना पड़ेगा मुझे।" तभी कमला चाची मुंह बनाते हुए बोली, "बस यही तो तेरे को आता है, बातें बनाना।" तभी वह लड़की कोयल कमला चाची के गले लगते हुए बोली, "प्लीज मां, खाना खिला दो ना।" तभी कमला चाची उसे पीछे की तरफ धक्का देते हुए बोली, "चल पीछे हट कल मुंही कहीं की, मेरे साथ चिपक कर मुझे भी गंदा कर रही है, कुत्तिया कहीं की।"

कमला चाची के मुंह से अपने लिए गालियां सुनकर कोयल का चेहरा पूरी तरह से उतर गया था। दूसरी तरफ प्रत्यक्ष, जो कि अभी-अभी घर में आया था। वह ऊपर की तरफ जा ही रहा था कि तभी यह बहस देखकर उसके कदम वहीं पर रुक गए। अब वह कमला चाची की तरफ देख रहा था। लेकिन उसने कुछ कहा नहीं। उसकी नज़रें कोयल पर ठहर गई थी, जो मायूस होकर अब अंदर की तरफ जाने को हुई थी। तभी कोयल के कानों में आवाज पड़ी, "तुम डाइनिंग टेबल पर बैठो, मैं अभी आता हूं।" इतना कहते हुए प्रत्यक्ष कोयल की तरफ देख रहा था। वही कोयल हैरानी से प्रत्यक्ष की तरफ देख रही थी। कोयल पहले भी प्रत्यक्ष से मिली थी, लेकिन प्रत्यक्ष ने कभी भी कोयल को ठीक से बुलाया नहीं था। जब वह बच्ची थी, तब भी प्रत्यक्ष उससे ठीक से बात नहीं करता था। लेकिन आज प्रत्यक्ष को अब खुद को बुलाता हुआ देखकर एक पल के लिए कोयल का चेहरा पूरी तरह से खिल गया था।

वह हां में सिर हिलाते हुए बोली, "हां भैया, जरूर।" इतना कहकर वह जल्दी से डाइनिंग टेबल पर बैठ गई। तभी कमला चाची उसे दांत पीसकर देखने लगी। इस वक्त उसे कोयल पर हद से ज्यादा गुस्सा आ रहा था। तभी हरीश जी उसकी तरफ गुस्से से देखते हुए बोले, "तेरी अपनी ही औलाद है वह, जिसे तू इस तरह से देख रही है। बेटी है हमारी, क्यों इतनी नफरत करती है उससे।" तभी कमला चाची उसकी तरफ देखते हुए बोली, "अगर बेटी है, तो बेटियों की तरह रहे भी, चूल्हा चौका संभाले। घर में इधर-उधर ना मटकती फिरे, मुझे बहुत नफरत है इससे।" इतना कहते हुए वह रसोई में चली गई। वही कोयल का चेहरा एक बार फिर से उतर गया। दूसरी तरफ प्रत्यक्ष, जो कि अपने कमरे में आया ही था, उसने अब अपने लिए कपड़े निकाले और कुछ ही देर में रेडी होकर नीचे की तरफ आया।

उसकी नजर एक बार फिर से डाइनिंग टेबल पर गई, जहां पर अब कोयल नहीं थी। जब उसे कोयल नहीं दिखाई दी, तो उसने हरीश जी की तरफ देखा। जैसे पूछ रहा हो कि कोयल कहां है। तभी हरीश जी उसकी तरफ देखते हुए बोले, "बेटा, वह चली गई है। उसकी मां ने उसे उठाकर भेज दिया अंदर।" हरीश जी की बात पर प्रत्यक्ष ने गहरी सांस ली और डाइनिंग टेबल पर आकर बैठ गया। लेकिन उसने कुछ कहा नहीं। कुछ ही देर में खाना लगा और प्रत्यक्ष ने एक नौकर को इशारा करते हुए प्लेट लगाने को कहा। नौकर ने प्लेट लगाई। अगले ही पल प्रत्यक्ष उसकी तरफ देखते हुए बोला, "यह कोयल को जाकर देकर आओ। यह चीज देखकर कमला चाची मुंह बनाते हुए बोली, "उसे देने की जरूरत नहीं है। एक दिन भूखी रहेगी, तो मर नहीं जाएगी।" तभी प्रत्यक्ष उनकी तरफ सर्द नजरों से देखते हुए बोला,

"खाना सब की जरूरत है, चाची, इसके लिए लोग बाहर धक्के खाते हैं। आप उसके मुंह से बैठे-बैठे वाला छीन रहे हैं।" इतना कहकर अब वह अपना खाना छोड़कर वहां से जा चुका था, क्योंकि प्रत्यक्ष को इस वक्त कमला चाची पर हद से ज्यादा गुस्सा आ रहा था। वह नहीं चाहता था कि कमला चाची को अपने मुंह से कुछ कह दे। इसलिए वह उठा और वहां से चला गया। अब प्रत्यक्ष वहां से निकला और कुछ ही देर में उसकी गाड़ी राठौर इंडस्ट्रीज के बाहर आकर रुकी। देखते ही देखते वह गाड़ी से बाहर निकलते हुए कंपनी में चला गया।

इस वक्त प्रत्यक्ष के चेहरे पर कोई भी भाव नहीं था। अब वह अपने केबिन में आकर अपना काम करने लगा। ऐसे ही सारा दिन बीत गया। प्रत्यक्ष अपने काम में कुछ इस कदर बिजी हो गया कि उसने अब किसी का भी ध्यान नहीं किया। काम करते-करते उसे 4:00 बज गए और 1 घंटे बाद महा आरती दोबारा से शुरू होने वाली थी। महा आरती में पहुंचना प्रत्यक्ष का बहुत ज्यादा जरूरी था। इसीलिए वह अपनी जगह से उठा और उसने टाइम की तरफ देखा। देखते ही देखते अब वह राठौर इंडस्ट्री से दोबारा से निकल चुका था।

वहीं दूसरी तरफ,

सुकन्या और रुखसाना प्राची के घर में पहुंची। इस वक्त प्राची बरामदे में बैठी बर्तन मांज रही थी। उसके हाथ इस वक्त पूरी तरह से चूल्हे की कालिख से रंगे पड़े थे। इस वक्त वह बड़ा सा पतीला मांज रही थी। उस पतीले को मांजते हुए ही उसके हाथ मे छाले हुए पड़े थे। बर्तन मांजते हुए ही पास ही में उसकी मामी कौशल्या बैठी हुई थी, जो कि अपने आप को पंखे से हवा करते हुए उसे ही देख रही थी और गालियां निकाल रही थी। वह गालियां निकालते हुए बोली, "रंडियां, जल्दी कर ले, कुत्तिया कहीं की। सारा दिन काम चोरी में लगी रहती है। यह तो मैं ना होऊ, तू तो कुछ करे ही ना। पिछले 1 घंटे से देख रही हूं, कभी वहां से बर्तन उठाती है, कभी वहां से बर्तन उठाती है। कपड़े जोड़ने में भी तूने 2 घंटे लगा दिए। इतने कपड़े थोड़ी ना थे।" इतना कहते हुए उसने बरामदे में पीछे की तरफ देखा, जहां पर बेड लगा हुआ था। उसे बेड पर इतनी ज्यादा दरिया कपड़ों की लगी हुई थी कि पूछो ही मत। ऐसा लग रहा था कि कौशल्या ने उसे दुकान के कपड़े पकड़े पकड़ा दिए हो जोड़ने के लिए। लेकिन उसे तो जैसे इस चीज का एहसास ही नहीं था। अब वह प्राची की तरफ देखते हुए बोली, "जल्दी हाथ चला।" इतना कहते हुए उसने दूसरी तरफ बर्तनों को देखा। नीचे पड़ा हुआ टोकरा पूरी तरह से भरा पड़ा था और एक और टोकरा उसी के पास पड़ा था। वह जो आधा भर चुका था और आधे बर्तन अभी प्राची के आगे पड़े हुए थे।

उन बर्तनों को देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे लंगर हाल के बर्तन हो। इतने ज्यादा बर्तन देखकर सुकन्या और रुखसाना को उसके लिए बहुत ज्यादा बुरा लग रहा था। लेकिन फिर भी वह गहरी सांस भरते हुए अंदर की तरफ आई। फिर कौशल्या की तरफ देखते हुए बोली, "चाची, महा आरती है, क्या आप चलेंगे नहीं वहां?" जैसे ही महा आरती का नाम सुना, कौशल्या जी मुंह बनाते हुए बोली, "मैं वहां पर जाकर क्या करूंगी।" तभी रुखसाना और सुकन्या बोली, "अरे अरे चाची, बहुत सारे लंगर लगने वाला है वहां पर। और आपको पता है अलग-अलग प्रकार के व्यंजन होंगे वहां पर, क्या आप खाने नहीं जाएंगे?" जैसे ही कौशल्या ने व्यंजनों का नाम सुना, उसके मुंह में पानी आ गया। वह खुश होते हुए बोली, "जरूर, मैं तो चलूंगी। मैं अभी तैयार होने जाती हूं।" अभी वह बोल ही रही थी, तभी सुकन्या और रुखसाना बोली,

"अरे अरे चाची, आप अकेली जाएगी। क्या प्राची नहीं जाएगी?" तभी कौशल्या मुंह बनाते हुए बोली, "इस कल मुंही को ले जाऊंगी, तो खाना कौन बनाएगा।" इतना कहते हुए वह गुस्से से प्राची को देख रही थी। जिसके सफेद कपड़े पूरी तरह से मिट्टी से रंग चुके थे।

वही प्राची का मुंह तो पूरी तरह से उतर चुका था। दूसरी तरफ से तभी कौशल्या जी के दूसरे बेटे राघव की आवाज आई। "हां मां, तुम जाओ, यह नहीं जाएगी। यह यहीं पर रहेगी। हमारे लिए खाना कौन बनाएगा। हम तो नहीं जा रहे हैं वहां पर।" जैसे ही प्राची ने राघव की आवाज सुनी, एक पल के लिए वह पूरी तरह से कांप उठी। उसके हाथ में जो बर्तन था, वह एक पल के लिए छूट गया और नीचे जमीन पर गिर पड़ा। राघव को देखकर सुकन्या और रुखसाना को भी गुस्सा आ रहा था, क्योंकि वह जानती थी कि राघव की नजर प्राची पर कैसी थी। इस वक्त वह दांत पीस रही थी और मन ही मन राघव को गालियां दे रही थी। वही राघव भी अपनी तिरछी नजरों से प्राची को देखते हुए मन ही मन बोला, "आज तो मेरी ख्वाहिश पूरी हो ही जाएगी। मां जा रही है, दो-तीन घटे तो नहीं आएगी। आज इसके साथ रंगरलियां मना ही ली जाए।" इतना कहते हुए राघव ने अपने होंठ को दांतो तले दबा लिया तभी कौशल्या जी बोली, "हां हां, यह चली जाएगी, तो खाना कैसे बनेगा। वैसे भी तुम्हारे चाचा जी घर पर आने वाले है। उन्हें भी साथ में लिए जाऊंगी। खाना भी तो बनेगा सुबह का, खाना नहीं तो कैसे चलेगा। इस रहने दो। अब खाना बनेगा, वहीं खाना सुबह भी चलता है हमारा। तो खाना बनना बहुत जरूरी है। इसे नहीं लेकर जाऊंगी मैं।" तभी सुकन्या मुंह बनाते हुए बोली, "लेकिन चाची।" अभी वह बोल ही रही थी कि तभी कौशल्या जी हाथ आगे बढ़ाते हुए बोली, "तू चुप कर, यह कहीं नहीं जाएगी, समझी। तुम लोग जाओ, हम आ रहे हैं।" इतना कहकर कौशल्या जी अंदर की तरफ चली गई। वहीं राघव इस वक्त अपनी हवस भरी नजरों से प्राची को देख रहा था। जिसे महसूस कर प्राची अंदर ही अंदर कांप रही थी। उसके माथे पर पसीने की बूंदे उभर आई थी और आंखों में आंसू उतर आए थे। वह जानती थी कि कौशल्या के जाते ही उसके साथ अब क्या होने वाला था ।

वैसे तो कौशल्या जी कहीं जाती ही नहीं थी, लेकिन जब भी वह 15 20 मिनट के लिए दूध लेने के लिए दूध वाले के घर जाती थी, तभी राघव अपना हाथ साफ करता था। वह हमेशा प्राची के साथ कुछ ना कुछ जबरदस्ती करने की कोशिश करता था। जिससे प्राची कुछ कर नहीं पाती थी। लेकिन आज तो कौशल्या जी काफी देर के लिए बाहर जा रही थी। आज शायद प्राची राघव से बचने नहीं वाली थी।

तकरीबन 15 20 मिनट बाद कौशल्या जी तैयार हुई। वहीं सुकन्या और रुखसाना निकल चुकी थी। उन्हें अब प्राची की चिंता हो रही थी। उनका दिमाग बार-बार खराब हुए जा रहा था कि अगर प्राची घर पर रह गई, तो राघव उसे छोड़ेगा नहीं। इतना सोचते हुए वह गांव के किनारे पर खड़ी हो गई। उनके चेहरे पर परेशानी झलक रही थी। दूसरी तरफ कौशल्या जी तैयार होकर राघव की तरफ देखते हुए बोली, "तुम्हारे बाबूजी हमारा मंदिर में ही वेट कर रहे हैं। हमें फोन आया था अभी थोड़ी देर पहले, तो हम जा रहे हैं। घर का किवाड़ बंद कर लेना। ध्यान रखना घर का, समझे ना।" इतना कहते हुए कौशल्या जी अब प्राची की तरफ देखते हुए बोली, "और तुम मनहूस खाना टाइम पर बना लेना, समझी ना तू।" इतना कहते हुए अब वह बाहर की तरफ चली गई। बाहर जाते ही जल्दी से राघव ने दरवाजा बंद किया। अब उसकी गहरी नजरे प्राची पर थी। दरवाजा बंद होते ही प्राची का दिल धक सा रह गया। अब वह पूरी तरह से कांप उठी। अभी भी उसके कपड़े गीले थे और मिट्टी से भरे हुए थे, क्योंकि अभी उसने अपने कपड़े चेंज नहीं किए थे। अभी-अभी वह बर्तन मांजकर हटी थी।

लेकिन अब तो ऐसे लग रहा था कि कपड़े बदलना भी उसका दुश्वार होने वाला था। राघव उसे अब गहरी नजरों से देखते हुए बोला, "तुझे कपड़े नहीं बदलने क्या? चल, तुझे कपड़े बदलवा दूं।" इतना कहते हुए वह धीरे-धीरे अपने कदम प्राची की तरफ बढ़ाने लगा। प्राची की आंखों से आंसू तेजी से बहने लगे।

To be continue....

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