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Adharsh ki jaal sajish

Hotel Paradise,

ध्वनि इस वक्त कैंटीन एरिया में बैठी कॉफी पी रही थी। अभी तक उसके दिमाग का हैंगओवर नहीं उतरा था। सारी रात उसने अपनी पलकें झपका कर नहीं देखा था। उसे अभी भी ऐसा लग रहा था, जैसे कोई अभी भी उसके आसपास घूम रहा हो। जिस वजह से उसको एक अलग ही बेचैनी हो रही थी। वह बार-बार अपनी नजरें इधर-उधर घूमाते हुए आसपास देख रही थी। लेकिन फिलहाल के लिए उसे कोई नजर नहीं आ रहा था। अभी वह अपने ध्यान में इधर-उधर देख ही रही थी कि तभी उसके कंधे पर किसी ने अपना हाथ रखा।

किसी का हाथ अपने कंधे पर महसूस कर ध्वनि अंदर तक कांप उठी। एक पल के लिए उसे ऐसा लगा, जैसे उसका कलेजा उसके मुंह को आ गया हो। अगले ही पल, हड़बड़ी में उसने पीछे मुड़कर देखा, तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गई। क्योंकि पीछे प्रतीक खड़ा था। प्रतीक को देखकर अब उसने जाकर राहत की सांस ली। वह जल्दी से प्रतीक की तरफ देखकर बोली, "यह क्या तरीका है सर, आप ऐसे ही...।"

अभी वह बोल ही रही थी कि तभी प्रतीक उसके चेहरे को अपने हाथों में भरते हुए बोला, "क्या हुआ ध्वनि, तुम इतनी ज्यादा घबरा क्यों रही हो, रिलैक्स?" इतना कहते हुए लगभग से उसने ध्वनि को हग करना चाहा, लेकिन ध्वनि ने उसकी चेस्ट पर हाथ रखकर उसे वहीं पर रोक दिया। लेकिन प्रतीक नहीं रुका। उसने जल्दी से ध्वनि के सिर को पकड़ कर अपने सीने से लगा लिया।

जिससे वहां पर बैठे आसपास के सभी कलीग ध्वनि को अजीब सी नजरों से देखने लगे। वहां पर बैठे लोग भी ध्वनि और प्रतीक को ही देख रहे थे। भले ही प्रतीक वहां का सीईओ था, लेकिन इसका गलत असर ध्वनि पर भी पड़ रहा था। वहां आसपास के सर्वेंट और कलीग ध्वनि को गलत समझ रहे थे। धोनी अब उसके सीने पर हाथ रखकर उसे पीछे करते हुए बोली, "प्लीज सर, आप ऐसे खुले में मुझे हग मत कीजिए, बुरा लगता है। सब लोग मुझे देख रहे हैं।" तभी प्रतीक झुंझलाते हुए बोला, "तो, देखते है तो देखते रहे।

अपना चेहरा देखो, कैसे पीला पड़ चुका है। हुआ क्या है आखिर? तुम सारी रात सोई नहीं हो। तुम्हारी आंखें कैसे हो चुकी हैं।" प्रतीक की बात पर एक बार फिर से ध्वनि के दिमाग में रात का वक्त घूम गया, जब रात को आदर्श उसे परेशान करने आया था। हालांकि उसने आदर्श का चेहरा नहीं देखा था। वह टच उसे जाना पहचाना लग रहा था। जैसे की बहुत पुरानी इससे मुलाकात हो। लेकिन फिर भी उसने इस चीज को अनदेखा किया। वह प्रतीक की तरफ देखकर फीका सा मुस्कुरा कर बोली, "नहीं सर, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। मैं बहुत अच्छे से सोई हूं। फिलहाल के लिए मेरा सिर दुख रहा है, इसलिए कॉफी पीने आई थी। अब तो मेरा ब्रेकिंग हॉर्स खत्म होने वाला है, सो मैं जा रही हूं।" इतना कह कर वह अपनी जगह से उठी। उसने कप साइड पर रखा और वहां से चली गई। लेकिन प्रतीक को पता नहीं क्यों, उसकी आवाज से ही उसके अंदर का खालीपन महसूस हो गया था।

उसे पता नहीं क्यों लग रहा था कि जैसे और दिन से आज ध्वनि कुछ ज्यादा ही थकी हुई थी। वहीं दूसरी तरफ कोई छुपकर यह चीज देख रहा था। इस वक्त उस शख्स की पूरी तरह से मुट्ठियां कसी हुई थी।

उस शख्स का चेहरा गुस्से से कांप रहा था। अब गुस्से से दांत पीसते हुए पास के पिलर पर उसने अपना पंच दे मारा और गुस्से में बोला, "जितनी देर उड़ सकती हो, उड़ लो, क्योंकि अब तुम्हारी आजादी मै छिनने वाला हूं। उस वक्त तुम कुछ नहीं कर पाओगी, mrs ध्वनि आदर्श चौहान।" इतना कहकर उसके चेहरे पर डेविल स्माइल आ चुकी थी। यह शख्स कोई और नहीं, आदर्श था। आदर्श अपने कमरे में आया और उसके सामने ही इस वक्त उसका पर्सनल असिस्टेंट खड़ा था। अब उसने अपने पर्सनल असिस्टेंट की तरफ देखा। इस वक्त आदर्श के चेहरे को देखकर ही पता चल रहा था कि उसके दिमाग में कुछ चल रहा हो।

उसने अपने असिस्टेंट की तरफ देखकर कुछ कहा, जिसे सुनकर असिस्टेंट जैसे-जैसे उसकी बात सुन रहा था, उसकी आंखें बड़ी होती जा रही थी। वह अब लड़खड़ाती हुई आवाज में बोला, "लेकिन सर, वह डर जाएगी। वह कल रात ही बहुत।" अभी वह बोल ही रहा था कि तभी आदर्श गुस्से से दांत पीसते हुए बोला, "तुम्हारा जितना काम है, उतना करो। लगता है, आजकल कुत्तों को मालिक बदलने की आदत पड़ गई है। मानता हूं, वह तुम्हारी मालकिन है। लेकिन यह मत भूलो, मैं तुम्हारा मालिक हूं।

और अभी तो उसका हश्र जो होगा, उससे उसकी रूह ना कांप जाए, तो मैं भी आदर्श चौहान नहीं।" इतना कहते हुए आदर्श किसी डेविल से कम नहीं लग रहा था।

इन 3 सालों में आदर्श बहुत ज्यादा बदल चुका था। पहले तो फिर भी आदर्श में इंसानियत नाम की चीज थी, लेकिन अब, अब आदर्श पूरी तरह से पत्थर दिल हो चुका था। उसे तो जैसे ध्वनि का दर्द दिखाई देना ही बंद हो चुका था। वह बढ़ते पल के साथ यही सोच रहा था कि वह किस तरह से ध्वनि को दर्द दें। लेकिन ध्वनि इस चीज से कोसों अनजान, दूसरी तरफ रूम सेटल कर रही थी।

रूम सेटल करते हुए ही उसके दिमाग में बार-बार कल रात की बातें गूंज रही थी। उसे याद करके ही उसके हाथ वहीं पर रुक जाते थे। लेकिन अब उसने एक गहरी सांस ली और खुद को कंट्रोल करते हुए बोली, "कंट्रोल ध्वनि, कंट्रोल, तुम यह कर सकती हो। छोटी-छोटी बातों को इतना सीरियस नहीं लेते। शायद वह मेरा कोई बुरा सपना था।"

इतना कहकर उसने गहरी सांस ली और उस कमरे से बाहर निकली। देखते ही देखते वह कमरे के बाहर आकर खड़ी हुई। उसने रूम का डोर लॉक किया। जैसे ही रूम का डोर लॉक हुआ, दरवाजा अपने आप खुल गया। यह देख ध्वनि को थोड़ा अजीब लगा। लेकिन अगले ही पल वह अंदर की तरफ आई और अंदर सिर्फ अंधेरा था। रूम के पर्दे हर तरफ लगे हुए थे और काफी डिम लाइट ऑन थी।

जैसे ही ध्वनि उस कमरे में आई, उसे एक अजीब सी स्मेल आनी शुरू हो गई, जो की बहुत ज्यादा मनमोहक थी। उस महक को महसूस करते हुए ध्वनि ने इधर-उधर देखा, जहां पर कैंडल्स जल रही थी। उन कैंडल्स को देखकर एक पल के लिए ध्वनि हैरान रह गई। वह कैंडल्स बहुत ज्यादा खूबसूरत थी। अगले ही पल, वह कैंडल्स के पास गई और उसने उसको छूने लगी। तभी उसका सिर घूमने लगा।

जैसे ही उसका सिर घूमने लगा, उसे कुछ गड़बड़ महसूस हुई। वह अपनी जगह से खड़ी होकर कमरे से बाहर जाने को हुई। लेकिन इससे पहले वह बाहर जाती, वह अपना होश पूरी तरह से गवा बैठी थी। आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा था। तभी उस रूम के बाथरूम का दरवाजा खुला और एक शख्स बाहर की तरफ आया, जिसके चेहरे पर डेविल स्माइल थी। जाहिर सी बात थी, यह शख्स कोई और नहीं, आदर्श था। जो अपनी डेविल नजरों से सामने खड़ी ध्वनि को देख रहा था। जो अपने सिर पकड़ कर खड़ी थी। इस वक्त ध्वनि को कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। वह किस तरह खुद को संभालने की कोशिश कर रही थी, लेकिन संभाल नहीं पा रही थी।

उसकी सांसे गहरी होती जा रही थी। गर्मी भी हद से ज्यादा लगनी शुरू हो गई थी। जिस वजह से वह अपने कपड़े खींचते हुए उन्हें अलग करने की कोशिश करने लगी थी। आदर्श, जो उसे इस तरह से देखकर बेहद सेडक्टिव नजरों से देख रहा था। अब वह गहरी आवाज में बोला, "बड़ी देर बाद कबूतरी हाथ में आई है। अब सारी रात मजे करने का वक्त आ गया है।" इतना कहते हुए उसने अपने दांतों को अपने होठों में दबाया। अभी वह अपने ख्यालों में ही था कि तभी ध्वनि उसके पास आकर खड़ी हुई और उसकी आंखों में देखते हुए बोली, "प्लीज, मेरी हेल्प कीजिए।"

उसकी बात पर आदर्श डेविल स्माइल के साथ बोला, "जरूर wifey, जरूर।" इतना कह कर उसने जोर से धक्का ध्वनि को बेड पर दिया।

जिससे ध्वनि को अपनी कमर में बेइंतहा दर्द हुआ और उसकी चीख निकल गई। इस वक्त वह कमर को पकड़ कर बुरी तरह से तड़प रही थी। लेकिन आदर्श को इस चीज से कोई लेना देना नहीं था। आदर्श, जो कि अपनी कमर पर टॉवल बांधे खड़ा था, अब उसने अपनी कमर से टॉवल हटाया और ध्वनि को गहरी नजरों से देखने लगा। उसे देखते हुए ही उसने अपनी होठों पर अपनी जीभ घुमाई।

To be continue...

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